रविवार, 1 सितंबर 2013

'मोर बाई के गोठ'


मोर बाई बहुत गोठकहरिन हे!

ओकर कोठ ल सुन के में असकटा जथंव,
तेकरे सेती फेसबुक म रही रही के हमा जथंव!

उहीच उही गोठ ल घेरी बेरी गोठियाथे,
अउ नै सुनव तहले अपने अपन रिसाथे !

ए जी-ए जी कहिके मोला रोज सुनाथे  ,
कहू कही कहिथव त मइके डहर दताथे !

मज़बूरी में महू ह मुड़ी ल नवाथव ,
हवच  हव कहिके बाई ल मनाथव !

कही कुछू लेहु  कहिके रोज बजार म जाथे ,
अपन बर कुछु लानै नहीं उल्टा मुहिल सजाथे !

काम बुता में जाथव तबले आँखी देखाथे,
चुरे पके में आथस कहिके मोला खिसियाथे !

बड़े फजर ले ओकर बिबित भारती चलथे,
जेनमा आनी बानी के समाचार निकलथे !

ममा घर के नेवता आहे कब जाबो बताना,
गजब दिन होगे, फुफू  ल फोन लगाना !

भतीजा बर कुरता लेहव तेला कब अमराबे?
राखी घलो ले दे हव जल्दी भैया घर जाबे !

काम बुता छबड़ाये होही त भैया ल झन बलाबे,
दाई ल कहि देबे  मोला तीजा म तही अमराबे !

लहुटती  मोर बहिनी घर तको हमावत आबे ,
तीजा में उहू ल जी दू दिन के अकता बलाबे !

इही चँदा के फंदा म मय बंदा हा  परगेंव,
अंजोरी अंधियारी म कतको कविता गढ़देंव !

फेर वोकर गोठ सुने बिना दिन नई पहाय ,
अपन बाई अपने होथे दुसर नई सहाय !

ओकर मया म का बतांव, मोर करेजा चुरथे!
अउ ओ चौके हिरनी सही,उल्टा मुही ल घुरथे !

पगला बलम सही,अइसे किंजरत रहिथंव!
येद घानी कस  बैला, गिंजरत  रहिथंव!

कभू कभू ओकर पिरित के बदरी ऐसे बरसथे,
फिजे हरदी सही मन, कुचराय बर तरसथे!

का गोंदा,का मोंगरा, का चंपा चमेली केकती,
रेवती,रतना,मिलापा मन मोहिनी ये सेवती!

जम्मो के मया बिरथा ओकर आगू म!
तेकरे सेती में फिरथव आजू बाजू म!

तेकरे सेती ये कविता अतेक रठ मारत हे!
अउ जम्मो मयारू मन अउ सुना काहत हे!



                                        श्री एमन दास मानिकपुरी
                                       सम्पर्क : औरी, भिलाई-3 दुर्ग छत्तीसगढ़ ।
                                       मोबाईल : 78289 53811

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